Dhanteras 2026: धनतेरस की पौराणिक कथा, पूजा विधि, खरीदारी नियम और चित्रकूट का भव्य दीपोत्सव मेला
आरोग्य, समृद्धि और आस्था का वह पावन महासंगम, जहाँ मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की तपोभूमि चित्रकूट दीपों की अलौकिक जगमगाहट से मुस्कुरा उठती है।
1. धनतेरस क्यों मनाई जाती है? (विस्तृत धार्मिक कथा व पूजा विधि)
दीपावली का पावन पर्व केवल एक दिन का उत्सव नहीं है, बल्कि यह पाँच दिनों तक चलने वाली आस्था, प्रकाश और समृद्धि की एक अविरल धारा है। इस महापर्व का पहला दीप जलता है धनतेरस (धन्वंतरि त्रयोदशी) की शाम को। हिंदू धर्म में मान्यता है कि "पहला सुख निरोगी काया, दूसरा सुख पास में माया", और धनतेरस का यह पर्व इसी जीवन दर्शन को सिद्ध करता है।
(क) समुद्र मंथन और भगवान धन्वंतरि का प्राकट्य
पौराणिक कथाओं के अनुसार, कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को देवों और असुरों द्वारा किए गए **समुद्र मंथन** के समय **भगवान धन्वंतरि** का प्राकट्य हुआ था। वे अपने चतुर्भुज हाथों में अमृत से भरा **स्वर्ण कलश** लेकर प्रकट हुए थे। भगवान धन्वंतरि को भगवान विष्णु का ही अवतार और संसार में आयुर्वेद का जनक माना जाता है। यही कारण है कि इस दिन धन से पहले आरोग्य (स्वास्थ्य) की प्राप्ति के लिए धन्वंतरि पूजन किया जाता है।
(ख) माता लक्ष्मी और कुबेर देव का पूजन
भगवान धन्वंतरि जी के साथ-साथ इस दिन स्वर्ग के कोषाध्यक्ष **कुबेर देवता** और धन-वैभव की देवी **मां लक्ष्मी** की विशेष पूजा का विधान है। मान्यता है कि इस दिन कुबेर जी की पूजा करने से घर की तिजोरी कभी खाली नहीं रहती और मां लक्ष्मी का वास स्थाई होता है।
(ग) यमदीपदान: अकाल मृत्यु से रक्षा की अनूठी परंपरा
धनतेरस की शाम को घर के मुख्य द्वार पर यमराज के नाम का एक चौमुखी दीपक (**यम दीपक**) जलाकर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके रखा जाता है। इसके पीछे की पौराणिक कथा राजा हिम के पुत्र की है, जिसे सर्पदंश से बचाने के लिए उसकी पत्नी ने मुख्य द्वार पर दीप जलाकर और गहनों का ढेर लगाकर यमराज का मार्ग रोक लिया था। इस दिन यमराज के निमित्त दीपदान करने से परिवार के सदस्यों की अकाल मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है।
2. धनतेरस पर खरीदारी की विस्तृत परंपरा: क्या खरीदें और क्या न खरीदें?
धनतेरस पर नया सामान घर लाना 'शुभता और तेरह गुना वृद्धि' का प्रतीक माना जाता है। माना जाता है कि इस दिन खरीदी गई वस्तु में अक्षय वृद्धि होती है।
पीतल व तांबे के बर्तन
भगवान धन्वंतरि कलश लेकर प्रकट हुए थे, इसलिए बर्तन खरीदना सबसे प्राचीन परंपरा है। पीतल धन्वंतरि जी की प्रिय धातु है, इसे लाने से आरोग्य और समृद्धि आती है।
सोने-चांदी के गहने व सिक्के
सोना और चांदी शुद्धता और महालक्ष्मी का रूप माने जाते हैं। इस दिन लक्ष्मी-गणेश जी अंकित चांदी का सिक्का या सोने के आभूषण खरीदना बेहद शुभ माना जाता है।
नई झाड़ू (दरिद्रता नाशक)
धनतेरस के दिन नई झाड़ू (विषम संख्या जैसे 1 या 3) खरीदना अनिवार्य माना गया है। झाड़ू को मां लक्ष्मी का प्रतीक माना गया है जो घर से अलक्ष्मी और कचरे को बाहर निकालती है।
साबुत धनिया व गोमती चक्र
इस दिन साबुत धनिया खरीदकर पूजा में रखा जाता है और बाद में इसे गमले या खेत में बोया जाता है। गोमती चक्र घर में धन की स्थिरता लाता है।
वाहन, प्रॉपर्टी व इलेक्ट्रॉनिक्स
आज के आधुनिक दौर में लोग धनतेरस को नया वाहन (कार, बाइक), जमीन-जायदाद की बुकिंग या इलेक्ट्रॉनिक सामान खरीदने का सबसे श्रेष्ठ मुहूर्त मानते हैं।
इस दिन लोहा, एल्युमिनियम, प्लास्टिक, कांच का सामान, और धारदार वस्तुएं (जैसे चाकू, कैंची) खरीदने से बचना चाहिए। ये वस्तुएं राहु और नकारात्मक ऊर्जा से जुड़ी मानी जाती हैं, जिससे घर में अशांति और धन हानि हो सकती है।
भारतीय समाज और व्यापारिक परंपरा में धनतेरस के दिन एक सख्त नियम का पालन किया जाता है—इस दिन न तो किसी को पैसा या सामान उधार दिया जाता है और न ही किसी से उधार लिया जाता है।
पौराणिक व व्यावहारिक कारण: धनतेरस वह पावन दिन है जब आप अपने घर में महालक्ष्मी और कुबेर की कृपा को आमंत्रित कर रहे होते हैं। यदि आप इस दिन अपने घर से धन या पूंजी किसी को उधार दे देते हैं, तो इसे अपनी बरकत और लक्ष्मी को घर से बाहर भेजने के समान माना जाता है। वहीं दूसरी ओर, इस दिन उधार लेने से भी बचा जाता है, क्योंकि मान्यता है कि धनतेरस पर लिया गया कर्ज साल भर बढ़ता ही रहता है (अक्षय ऋण)। इसलिए इस दिन नकद खरीदारी और घर की समृद्धि को संजोने पर ही जोर रहता है।
4. चित्रकूट का ऐतिहासिक दीपोत्सव मेला: आस्था, संस्कृति और जनसैलाब
जब बात चित्रकूट की हो, तो धनतेरस का यह दिन सिर्फ खरीदारी तक सीमित नहीं रहता। मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्री राम की पावन तपोभूमि चित्रकूट में इस दिन से **5 दिनों तक चलने वाले बुंदेलखंड और मध्य भारत के सबसे बड़े लखी मेले** का विधिवत व भव्य आगाज हो जाता है।
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कामदगिरि परिक्रमा व जयकारे: धनतेरस की रात से ही कामदगिरि पर्वत की 5 किलोमीटर की पवित्र परिक्रमा करने वाले लाखों श्रद्धालुओं का हुजूम उमड़ पड़ता है। "जय सिया राम" और "कामतानथ भगवान की जय" के जयकारों से पूरा परिक्रमा मार्ग गूंज उठता है। श्रद्धालु नंगे पांव परिक्रमा लगाकर दीप जलाते हैं।
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गुप्त गोदावरी: इस दिन गुप्त गोदावरी की ऐतिहासिक एवं रहस्यमयी गुफाओं में शीतल जलधारा के दर्शन और पूजन के लिए तड़के से ही श्रद्धालुओं की लंबी-लंबी कतारें लग जाती हैं।
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रामघाट एवं महाआरती: शाम होते ही रामघाट का दृश्य स्वर्णिम हो जाता है। मंदाकिनी (पयस्विनी) नदी के तटों पर लाखों दीये प्रज्वलित किए जाते हैं। जल में तैरते दीपों को देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो पूरा आकाश रामघाट पर उतर आया हो। साधु-संतों के शंखनाद और डमरू की ध्वनि वातावरण को दिव्य बना देती है।
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हनुमान धारा, स्फटिक शिला व सती अनसूया आश्रम: पहाड़ की ऊंचाई पर स्थित हनुमान धारा, मंदाकिनी किनारे स्थित स्फटिक शिला और घने जंगलों में मंदाकिनी के उद्गम स्थल सती अनसूया आश्रम पर दूर-दूर से आए श्रद्धालुओं का भारी जमावड़ा रहता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
धनतेरस पर सबसे पहले आरोग्य के देवता भगवान धन्वंतरि की पूजा की जाती है। इसके बाद धन के देवता कुबेर, मां लक्ष्मी और संध्याकाल में मुख्य द्वार पर यमराज के नाम चौमुखी दीपक (यमदीपदान) जलाया जाता है।
धनतेरस पर पीतल और तांबे के बर्तन खरीदना सबसे शुभ माना जाता है। पीतल भगवान धन्वंतरि की अतिप्रिय धातु मानी जाती है, जो घर में आरोग्य लाती है।
मान्यता है कि धनतेरस के दिन घर से धन या सामान उधार देने से घर की बरकत और मां लक्ष्मी विदा हो जाती हैं। वहीं इस दिन कर्ज लेने से वह साल भर बढ़ता ही रहता है।
चित्रकूट में मेला मुख्य रूप से रामघाट, कामदगिरि परिक्रमा मार्ग, गुप्त गोदावरी और हनुमान धारा क्षेत्र में लगता है। यह मेला धनतेरस से शुरू होकर भाईदूज तक लगातार 5 दिनों तक चलता है।
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