स्फटिक शिला: प्रभु श्री राम और माता जानकी की पावन विश्राम स्थली
चित्रकूट का वह दिव्य स्थान जहाँ घटी थी इंद्रपुत्र जयंत के उद्धार की पौराणिक कथा
स्फटिक शिला चित्रकूट का एक अत्यंत पवित्र और प्राचीन धार्मिक स्थल है। मान्यता है कि वनविहार के दौरान भगवान श्री राम माता जानकी के साथ इसी शिला (चट्टान) पर विश्राम किया करते थे। मंदाकिनी नदी के तट पर स्थित यह पावन शिला आज भी प्रभु के चरणों की स्पर्श-स्मृति को समेटे हुए है।
गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्रीरामचरितमानस के अरण्यकाण्ड में इस पावन दृश्य और यहाँ घटी एक मुख्य लीला का बड़े ही सुंदर और भावपूर्ण ढंग से वर्णन किया है:
जिमि पिपीलिका सागर थाहा। महामंद मति पावन चाह॥"
चला रुधिर रघुनायक जाना। सीक धनुष सायक संधाना॥"
ब्रह्मधाम शिवपुर सब लोका। फिरा अमित व्याकुल भय शोका॥"
नायद देखा विकल जयंता। लागी दया कोमल चित संता॥"
इस प्रसंग का अर्थ एवं कथा
स्फटिक शिला पर विश्राम के समय इंद्र का मूर्ख पुत्र जयंत कौए (बायस) का रूप धारण करके प्रभु श्री राम के बल की परीक्षा लेने आया। उसकी मंदबुद्धि और दुष्टता का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है, जैसे कोई छोटी सी चींटी समुद्र की थाह (गहराई) नापना चाहती हो।
मंत्र से प्रेरित होकर वह ब्रह्मास्त्र जयंत के पीछे दौड़ पड़ा। अत्यधिक भयभीत जयंत अपनी जान बचाने के लिए ब्रह्मलोक, शिवलोक और समस्त तीनों लोकों में भागा, लेकिन प्रभु श्री राम से द्रोह करने वाले को किसी भी लोक में शरण नहीं मिली।
अंत में, महर्षि नारद जी ने उसकी अत्यंत व्याकुलता देखकर दयावश उसे पुन: प्रभु श्री राम की शरण में ही जाने की सलाह दी। जब जयंत ने कातर भाव में रोते हुए प्रभु के चरणों में गिरकर क्षमा मांगी, तो दयालु श्री राम ने उसके प्राण तो बख्श दिए, परंतु दंड स्वरूप उसकी एक आँख फोड़कर उसे छोड़ दिया।
ऐतिहासिक एवं धार्मिक साक्ष्य
इस पौराणिक घटना के साक्ष्य के रूप में आज भी मंदाकिनी नदी के पार एक पहाड़ी स्थित है, जिसे श्रद्धालुओं द्वारा 'जयंत पहाड़ी' के नाम से जाना जाता है।
सबसे अद्भुत बात यह है कि स्फटिक शिला पर आज भी प्रभु श्री राम और माता सीता के चरण-चिन्ह स्पष्ट रूप से अंकित हैं। इस शिला के दर्शन मात्र से श्रद्धालुओं को त्रेतायुग की उस दिव्य लीला और प्रभु के साक्षात उपस्थिति की पावन अनुभूति होती है।
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