दुखों और पापों का नाश करने वाला धाम
तुलसीदास जी कहते हैं कि चित्रकूट केवल पत्थरों का पहाड़ नहीं है, बल्कि यह साधना और शांति का एक जीवित केंद्र है। यह पर्वत सांसारिक प्रलोभनों से परे, आकाश की ऊंचाइयों को छूता हुआ एक निष्काम योगी की तरह खड़ा है। इसकी विशाल गोद में बैठकर तपस्या करने वाले हर भक्त और साधक को जीवन की परम सिद्धि (ईश्वर की प्राप्ति) सहज ही मिल जाती है।
यह चौपाई श्री रामचरितमानस के अयोध्याकांड से ली गई है। जब भगवान श्री राम, माता सीता और लक्ष्मण जी वनवास के दौरान चित्रकूट पहुँचे थे, तब गोस्वामी तुलसीदास जी ने चित्रकूट पर्वत की अलौकिक सुंदरता और उसके आध्यात्मिक स्वरूप का वर्णन करते हुए इन पंक्तियों की रचना की थी।
1. पहली पंक्ति:
शब्दार्थ:
- गिरि: पर्वत
- रमि अति सुंदर: रमणीक और अत्यंत सुंदर
- बेधत गगन: आकाश को छेदता हुआ (बहुत ऊँचा)
- निसंग: निःसंग (आसक्ति/मोह से रहित, अकेला, निष्पक्ष)
अनिंदर: अनिंद्य (जिसकी कोई निंदा न कर सके, निर्दोष, श्रेष्ठ)
विस्तार से अर्थ:
चित्रकूट का यह पर्वत अत्यंत रमणीक, सुंदर और भव्य है। यह पर्वत इतना ऊँचा है कि मानो निडर होकर आकाश को स्पर्श कर रहा हो या उसे छेदता हुआ ऊपर उठ रहा हो। जैसे कोई निष्काम और विरक्त संत बिना किसी सांसारिक मोह-माया के (निसंग) और बिना किसी दोष के (अनिंद्य/निर्दोष) ध्यान में लीन होकर सीधा ईश्वर की ओर उठता है, ठीक वैसे ही यह पर्वत भी स्थिर, निर्भय और निश्छल खड़ा है।
2. दूसरी पंक्ति:
कमठ पीठि जनु गोद पसारे। बिराजत सब साधन सिधारे॥
शब्दार्थ:
- कमठ: कछुआ (कूर्म)
- पीठि: पीठ
- जनु: मानो (उत्प्रेक्षा अलंकार)
- गोद पसारे: गोद फैलाए हुए
- बिराजत: सुशोभित है / विराजमान है
सब साधन सिधारे: सभी प्रकार के साधनों और सिद्धियों से युक्त / साधकों को सिद्धि देने वाला
विस्तार से अर्थ:
चित्रकूट पर्वत की बनावट ऐसी ढलानदार और चौड़ी है मानो कोई विशाल कछुआ (कमठ) अपनी पीठ ऊपर किए अपनी गोद फैलाकर बैठा हो। जिस प्रकार कछुआ अपनी ढाल जैसी पीठ पर सबको आश्रय देता है, उसी प्रकार चित्रकूट पर्वत भक्ति और ज्ञान के साधकों को अपनी गोद में शरण देता है। यहाँ भक्ति, तपस्या और साधना के समस्त साधन स्वतः ही सिद्ध हो जाते हैं; अर्थात जो भी साधक यहाँ आता है, उसकी साधना बिना किसी विघ्न-बाधा के पूरी हो जाती है।






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